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Wednesday, September 7, 2011

अकेलापन !!!!!








मैं कल भी अकेली थी --मैं आज भी अकेली ही हूँ ?
रहू  कैसे तेरी यादों के खंडहर से दूर जाकर --
क्यों सलीब पर लटकाऊ अपनी भावनाओ के पिंजर को 
इक यही तो मेरी पूंजी हैं -इस खजाने को किस पर लुटाऊ 
कहने को तो मैं जिन्दा हूँ -होश भी हैं मुझको
फिर यह आत्मा क्यों भटकती हैं सिर्फ तुम्हे पाने को 
जिन्दगी की इस अधूरी चाह को कैसे ढूँढू ? कहाँ ढूँढू -
कहाँ फैलाऊ अपना आँचल! कहाँ माथा रगडू
इस स्वार्थी लोक में मैंरा तो कोई सगा नहीं ?
सभी बेगाने हैं यहाँ मेरा तो कोई अपना नहीं !    





वो  लोग जिनको समझती थी जिन्दगी अपनी !  
वही लोग दिल को दुखाने की बात करते हैं !